सत्याग्रह फिल्म ने सत्याग्रह की अहमियत को कम किया है, अपमान किया है और हारा हुआ महसूस कराया है. ऐसा लगता है फिल्म काफी हद तक अन्ना आन्दोलन के बाद जो हुआ उसके सही ठहराने के लिए बनायीं गयी है.
किस तरह से हिंसा को सत्य पर हावी होते हुए दिखाया गया है, ऐसा मेसेज देना कि नेताओं से कोई जीत ही नहीं सकता ये महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का अपमान है. सत्याग्रह शब्द और प्रकाश झा कि बजह से ये फिल्म जनता देखने जा रही है पर कमजोर स्क्रिप्ट ओर भटकता हुआ अंत सिर्फ लोगों को निराश करेगा बस.
इस फिल्म का नाम सत्याग्रह गलत रखा गया है, इसका नाम राजनीति २ ज्यादा सही रहेगा. कलाकार सभी अच्छे हैं पर दमदार रोल कि अगर बात करें तो सिर्फ मनोज बाजपाई ही जमे हैं, वो जब भी परदे पर आये हैं दर्शकों को अच्छा लगा भले ही वो negative रोल में क्यों न हों.
इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता है कि गाँधी से लेकर आजतक जितने भी आन्दोलन (जिनका किसी पार्टी से कोई मतलब नहीं) हुए हैं वो सब बेकार हुए हैं, ऐसा लगता है कि राजनीति में जो गन्दगी है उसे कभी साफ़ ही नहीं किया जा सकता. निराशाजनक है ये फिल्म.
किस तरह से हिंसा को सत्य पर हावी होते हुए दिखाया गया है, ऐसा मेसेज देना कि नेताओं से कोई जीत ही नहीं सकता ये महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का अपमान है. सत्याग्रह शब्द और प्रकाश झा कि बजह से ये फिल्म जनता देखने जा रही है पर कमजोर स्क्रिप्ट ओर भटकता हुआ अंत सिर्फ लोगों को निराश करेगा बस.
इस फिल्म का नाम सत्याग्रह गलत रखा गया है, इसका नाम राजनीति २ ज्यादा सही रहेगा. कलाकार सभी अच्छे हैं पर दमदार रोल कि अगर बात करें तो सिर्फ मनोज बाजपाई ही जमे हैं, वो जब भी परदे पर आये हैं दर्शकों को अच्छा लगा भले ही वो negative रोल में क्यों न हों.
इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता है कि गाँधी से लेकर आजतक जितने भी आन्दोलन (जिनका किसी पार्टी से कोई मतलब नहीं) हुए हैं वो सब बेकार हुए हैं, ऐसा लगता है कि राजनीति में जो गन्दगी है उसे कभी साफ़ ही नहीं किया जा सकता. निराशाजनक है ये फिल्म.