हर आम आदमी यही चाहता है की सब कुछ ठीक ठाक चलता रहे, ओर एक दिन हम नैचुरल मौत मर जाएँ लेकिन अचानक कोई ट्रेन एक्सिडेंट होता है या फिर बम फट जाता है मरता कौन है आम आदमी. जिनका खुद का कोई मरता है उसके मन कई सवाल होते हैं जैसे ट्रेन की पटरी वही है जो अंग्रेज़ डाल गए, हमने बदली क्यों नहीं, बम ऐसे तो फट नहीं सकता जबतक कोई अपने देश का मिला ना हो, इस सरकार में सब बिके हुए हैं... बगैरह बगैरह. ओर सही भी है लेकिन जिनका कोई मरता नहीं है वो या तो उस दर्द को महसूस नहीं कर पाते या करना नहीं चाहते बस न्यूज़ से चिपक के सारी जानकारी लेते हैं. देश में कहीं भी कोई भी अननैचुरल मरता है तो कहीं ना कहीं ये 543 लोग इसके जिम्मेदार होते हैं
अब 100 प्रतिशत किसी भी चीज़ को रोका नहीं जा सकता सही है लेकिन अगर ये 543 लोग हरामखोरी छोड़कर काम में लग जाये तो जितनी आसानी से हिंदुस्तान में आदमी मर जाता है वो नहीं मरेगा, बात ये है ये लोग क्यों सुधरें जब ऐसे मज़े आ रहे हैं, यही बात ये लोग हमेशा पूंछते हैं कि हम क्यों सुधरें तुमे मरना है तो मरो, हमने हिम्मत दिखाई है राजनीति में आने कि तो मज़े भी हमी लेंगे, वो 543 लोग यही कह रहे हैं. अब सब कुछ आम आदमी के ऊपर डिपेंड करता है कि कैसे मरना है नैचुरल मौत या जलील मौत.
अब 100 प्रतिशत किसी भी चीज़ को रोका नहीं जा सकता सही है लेकिन अगर ये 543 लोग हरामखोरी छोड़कर काम में लग जाये तो जितनी आसानी से हिंदुस्तान में आदमी मर जाता है वो नहीं मरेगा, बात ये है ये लोग क्यों सुधरें जब ऐसे मज़े आ रहे हैं, यही बात ये लोग हमेशा पूंछते हैं कि हम क्यों सुधरें तुमे मरना है तो मरो, हमने हिम्मत दिखाई है राजनीति में आने कि तो मज़े भी हमी लेंगे, वो 543 लोग यही कह रहे हैं. अब सब कुछ आम आदमी के ऊपर डिपेंड करता है कि कैसे मरना है नैचुरल मौत या जलील मौत.