हिंदुस्तान में मुद्दों की कमीं नहीं आप सुबह उठो आपको नया मुद्दा मिलेगा, दिन भर आप उस पर निकल सकते हो, अगले दिन फिर नया और कभी कभी तो कई सारे इकट्ठे. हम आदि हो गए हैं इन चीज़ों के, हमें फिक्र ही नहीं है कि :
जिस गली से गुजर कर हम काम पर जातें हैं वो कई सालों से टूटी है, कई बार गिरे हैं लेकिन ठीक है,
बरसात में घर के बहार कि नालियां जाम हो जाती हैं लेकिन ठीक है,
पिताजी को पेंसन के लिए कुछ खिलाना पड़ता है लेकिन ठीक हैं,
बच्चे का एड्मिसन नहीं हो पा रहा फीस बहुत है लेकिन ठीक है,
आधी सेलरी तो दवाओं में चली जाती है लेकिन ठीक है,
यूरिया और कीटनाशक इतने महंगें हैं क़ी खेती में कुछ बचता ही नहीं लेकिन ठीक है,
पिछले पांच साल से वही पतली बेल्ट पहन रहे हैं लेकिन ठीक है,
किराया दिन पर दिन बढता जा रहा है और घर लेने क़ी औकात नहीं लेकिन ठीक है,
कार ले तो ली थी पर चलती कम है क्योंकि पेट्रोल बहुत महंगा है लेकिन ठीक है,
केवल दाल रोटी प्याज़ से गुजरा हो नहीं सकता लेकिन ठीक है...
लेकिन ठीक है, लेकिन ठीक है, लेकिन ठीक है ये कह कह के हम आदि हो गए हैं इन चीज़ों के. असली मुद्दे कभी नज़र ही नहीं आते, क्योंकि आप सुबह उठो आपको नया मुद्दा मिलेगा, दिन भर आप उस पर निकल सकते हो.
जिस गली से गुजर कर हम काम पर जातें हैं वो कई सालों से टूटी है, कई बार गिरे हैं लेकिन ठीक है,
बरसात में घर के बहार कि नालियां जाम हो जाती हैं लेकिन ठीक है,
पिताजी को पेंसन के लिए कुछ खिलाना पड़ता है लेकिन ठीक हैं,
बच्चे का एड्मिसन नहीं हो पा रहा फीस बहुत है लेकिन ठीक है,
आधी सेलरी तो दवाओं में चली जाती है लेकिन ठीक है,
यूरिया और कीटनाशक इतने महंगें हैं क़ी खेती में कुछ बचता ही नहीं लेकिन ठीक है,
पिछले पांच साल से वही पतली बेल्ट पहन रहे हैं लेकिन ठीक है,
किराया दिन पर दिन बढता जा रहा है और घर लेने क़ी औकात नहीं लेकिन ठीक है,
कार ले तो ली थी पर चलती कम है क्योंकि पेट्रोल बहुत महंगा है लेकिन ठीक है,
केवल दाल रोटी प्याज़ से गुजरा हो नहीं सकता लेकिन ठीक है...
लेकिन ठीक है, लेकिन ठीक है, लेकिन ठीक है ये कह कह के हम आदि हो गए हैं इन चीज़ों के. असली मुद्दे कभी नज़र ही नहीं आते, क्योंकि आप सुबह उठो आपको नया मुद्दा मिलेगा, दिन भर आप उस पर निकल सकते हो.